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आशीर्वाद का असर – motivational story in hindi –

आशीर्वाद का असर से धरती पर मौजूद सभी जीव -जंतु ,पेड़ -पौधा और मनुष्य के लिए भावनात्मक रूप से निर्मित किये गए आशीर्वाद का कितना महत्व है |

इसे इस कहानी से समझा जा सकता है ।

किसी के द्वारा किसी के लिए किये गए मन में भावनात्मक रूप से अच्छी आशीर्वाद और बुरे आशीर्वाद से क्या फर्क पड़ता है ?

इस कहानी से आप अच्छी तरह समझ सकते हैं ।

आप अगर खुद की भावना पर ध्यान केंद्रित करेंगे

तो कहानी के मूल भावना और उद्देश्य को बेहतर समझ भी सकते हैं ।

क्या पता इसे अपने बेहतरी के लिए शायद अच्छे आशीर्वाद के असर लिए भावना का इस्तेमाल करना भी सीख ले|

क्योंकि आशीर्वाद किसी भी जीव -जंतु ,पेड़ -पौधा और मनुष्य के लिए संजीवनी बूटी की तरह काम करता है ।

सेमीनार – आशीर्वाद का असर

एक बार किसी शहर में एक सेमीनार आयोजित किया गया |

सेमीनार में अपने -अपने क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञ जो सफल लोगो के हस्ती में शामिल थे |

सभी को  अपने -अपने सफलता की कहानी सुनाने के लिए बुलाया गया |

सभी के कहानी अलग-अलग और रोमांचित, प्रोत्साहित और प्रेरित करने वाला था |

लेकिन उनमे में से एक नव धनाढ्य लकड़ी के Salesman और Businessmanकी कहानी सभी को न केवल कुछ करने के लिए रोमांचित,प्रोत्साहित ,प्रेरित किया

,बल्कि लोगों को हृदय को इतना सुकून मिला कि पूरा ऑडिटोरियम सभी प्रशंशकों के आंखों में ख़ुशी के आंसू से भर गए ।

आशीर्वाद से लबरेज तालियों के गरगराहट से पूरा ऑडिटोरियम कई मिनटों तक सरोबार रहा |

Businessman तालियों भरी आशीर्वाद से गदगद हो गया |

पिताजी का विरोध – आशीर्वाद का असर

कहानी कुछ इस प्रकार बयान किया गया |

मैं कोई बारह बरस का रहा होगा जब मुझे मेरे पिताजी ने घर से निकाल दिया |

क्योंकि मैं आलसी ,बातूनी और हर बात के लिये लोगों को आलोचना और बुराई करता रहता था

,जिसके कारण हमेशा परिवार के लोगों से मारपीट होता रहता

परिणामस्वरूप हमारे व्यवहार से आजिज होकर मुझे घर से बाहर निकाल दिया था |

ऐसा नहीं था की मेरा ही व्यवहार सिर्फ ऐसा था |

लेकिन  शायद परिवार के भविष्य के लिए पिताजी के नजरों में मेरा रहना बर्दास्त के बाहर था |

पिताजी का विरोध करने का साहस मेरी माँ में नहीं थी |

इसलिए जाते समय मेरी माँ ने मुझे कुछ खाने के सामान देने के साथ अश्रु भर आँखों से विदा किया |

भारी कदमो से घर से निकलते समय शैतान आदत वाला मन परिवार को धिक्कार रहा था

वहीँ आत्मा खुद को धिक्कार रहा था तू बुरी आदतों के वश में आ गया है |

इस मन और आत्मा के बीच वाद-विवाद करते-करते कब जंगल में पहुँच गए पता ही नहीं चला |

तब कदम शरीर को साथ देने में असमर्थता व्यक्त करने लगा और मन भी आत्मा के साथ विवाद करते-करते थक गया था |

जंगल

मन इतना भारी हो गया था कि सिर में दर्द होने लगा था |

थक -हार कर कम छायादार पेड़ के नीचे बैठ गया |

संयोग से नजदीक में ही एक मीठे पानी का झील था |

भूख भी सताने लगा था तभी माँ का दिया हुआ रोटी और सब्ज़ी निकाला और खाने लगा |

मन ही  मन पेड़ को श्रापित भी कर रहा था कि इस पेड़ का जंगल में क्या महत्व है|

ठीक से छाँव  भी नहीं मिलता |

इसका लकड़ी भी किसी तरह से उपयोग किया जाता |

इसका फल भी खाने लायक नहीं होता है,फिर जंगल में इस पेड़ क्या महत्व है |

इससे अच्छा है इसे सूख जाना चाहिए |

इन बातों को कई बार कहते हुए दोहरा रहा था  |

चूँकि हरा पेड़ भी सजीव होता है ,जब भी पेड़ को भावना से बुराई करते हुए श्रापित कर रहा था

तब पेड़ सूरज की गर्मी से ज्यादा श्राप वाला आशीर्वाद का असर से लू की तपिश महसूस करता था |

तोते की पुकार

उसी दौरान हम खा रहे थे

उसी पेड़ के खोह में से घोसले के नजदीक दो तोता मानव की भाषा में हमें अच्छा आशीर्वाद देते हुए आपस में बोल रहा था

ये मानव कितने अच्छे लग रहे हैं |

कितना भला लग रहे हैं ,काश हमलोगों के  भूख को समझ पाते और कुछ भोजन हमारे लिए छोड़ देते

ताकि अपने भूख मिटा पाते  तोता की भावना को समझते हुए उन्होंने अंतिम रोटी तोता के तरफ बढ़ा दिय

जैसे ही तोता के बोलने और रोटी देने से अजीब सा मन में शांति का एहसास हुआ |

मन में दोनों तोते के प्रति अच्छे -अच्छे आशीर्वाद ,ममता से भरी प्यारी -प्यारी भावना आने लगी

,तब मैं उस के लिए दुआएं प्रकट करने लगा ।

जहाँ मैं पेड़ के लिए बददुआ कि भावना का निर्माण करता था

,वहीं दोनों तोते के लिए आशीर्वाद और दुआ कि भावना का निर्माण करता था ।

हालाँकि मैं इसे अनजाने में कर रहा था और लगातार कई दिनों तक करता रहा ।

एक दिन मैं भटक रहा था सारे दिन भोजन नसीब नहीं हुआ था

,तभी मेरे कान में लाउडस्पीकर से प्रवचन कि आवाज़ सुनाई दिया

और मैं इस आस में उस ओर मुड़ता ही चला गया कि शायद मुझे कुछ भोजन भी मिल जाये|

प्रवचन स्थल

जब मैं प्रवचन स्थल पर पहुंचा और जो दो बातें उनकी सुनी मेरे दिल को छू लिया ।

मैंने संकल्प लिया क्यों न इस विचार को जीवन मैं अमल करके प्रमाणित सत्य को जाँच करके देख लें ।

वहीँ लंगर भी चल रहा था ,वहां भोजन भी किया

और थोड़ी सी उस पक्षियों के लिए भी कुछ अन्न ले लिया ।

फिर संत कि इसी बात को सोचते-सोचते आश्रय स्थल तक पहुंच गया ।

जाते ही उसने पक्षियों के घोंसला में दाना को रख दिया ।

तभी मुझे उस तोते कि आवाज़ सुनाई दिया

,वह अपने साथी से कह रही थी

हे संगी अगर ये मानव दो काम करना आज से शुरू कर दे तो इसकी जिंदगी में सुख ही सुख होगा ।

ये दोनों बाते न करीब -करीब वही थी जिसे संत ने बताया था।

फिर तो मेरे मन को पूरा विश्वास हो गया ,तभी से मैं उस पर अमल करने लगा ।

जंगल की लकड़ी

सवेरे उठा जंगल के भीतर गया ,कुछ लकड़ी इकठ्ठा किया शहर में गया ।

जल्दी ही सभी लकड़ी बिक गए,

उनमे से आधे लकड़ी के पैसे से भोजन के सामान और बर्तन लाया और खुद ही खाना बनाने लगे ।

अगले दिन फिर जंगल से लकड़ी बाजार लेकर गया ,बेचकर वापस आया ।

इसी तरह रोज की दिनचर्या बन गया ।

जैसे -जैसे बाजार की समझ बढ़ता गया और हम सीखते गए

,उसे व्यवहार में लाते गए फिर जरूरत के अनुसार सुधार करते गए ।

इस दौरान समस्याएं आती रही ,जब भी समस्या को सुलझाते थे ऐसा लगता था मानो एक कदम आगे बढ़ गए हैं|

जितनी बड़ी चुनौती को निपटाया उतनी बड़ी सफलता मिलती गयी और उतना ही लोगों के प्यार ,सम्मान के साथ प्रतिष्ठा मिला ।

मेरा सपना है की आजन्म लोगों के जीवन और चिंताओं को कम करते हुए अपना जीवन बिताते रहें ।

किसी महान पुरुष ने कितना सटीक कहा है कि ईश्वर इंसान के रूप में सामने आते हैं ।

आपके जीवन का मार्ग दिखाकर ओझल हो जाते हैं ।किन्तु नक्शे पर चलना तो हम पर निर्भर करता है ।

हमारा प्रयास , हमारी क्षमता और हमारा स्वयं पर विश्वास ही हमे साधारण से असाधारण बना सकता है ।

आज अगर हम आपके सामने जो सफलता की कहानी सुना रहा हूँ ।

इस सफलता के पीछे का रहस्य यह है कि संत और तोता के वचन का जीवन में चलनेवाली सांस के हर पल में इसे हमने अक्षरश: पालन किया ।

संतजी और तोता के नियम – आशीर्वाद का असर

संत जी ने सफलता हासिल करने के लिए जो दो नियम बातये ।

पहला नियम – किसी को भी किसी भी परिस्थिति में आलोचना न करें ,निंदा न करें ,शिकायत न करें और साथ ही दूसरे की सफलता में दिल से खुश होकर उन्हें और तरक्की करने के लिए मन से शुभाशीर्वाद दें ।

जितना सम्भव हो सके हर समय खुद के साथ -साथ दूसरों के लिए भी सकारात्मक विचार ही सोचे ।

इसका पहला फायदा होगा खुद को आत्मविश्वास से भरपूर महसूस करेंगे साथ ही लोगों से मान -सम्मान के साथ स्वीकीर्ति भी मिलने लगेगी ।

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दूसरा नियम -जिंदगी में जो भी हासिल करना चाहते हैं ,जैसा बनना चाहते हैं ।

खुद को उस स्थिति में रखते हुए दृश्य को मन में रचें ।

इसके साथ ही वर्तमान में उस लक्ष्य के लिए जो भी कर सकते हैं करें ।

हर समय अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर करते रहें ।

एक सुब कुछ हक़ीक़त बन जायेगा ।यही परम् सत्य है ।

कुछ इसी तरह कि बातें तोता ने भी बताया ।

पहला नियम -चाहे कोई भी कितना भी कष्ट क्यों न दे फिर भी उसके साथ -साथ मन में या सामने आनेवाले किसी भी पेड़ -पौधा , जीव जंतु और मनुष्य के लिए हमेशा शुभ विचार ही सोचें ।

क्योंकि जैसा हम सोचते वैसा ही प्रकृति से वापस मिलती है ।

दूसरा नियम -आज को व्यर्थ न जाने दे ,जो कर सकते हैं करें और जब भी मदद मांगे अगर आप से सम्भव हो तो मदद कर दें ।

वचन का पालन

उस दिन से हर समय मैंने इस वचन को जेहन में रखते हुए वर्तमान में जो कर सकता था करता रहा ।

जब तक जिस पेड़ के नीचे रहते थे उसी पेड़ को बद्दुआ देते रहे ।

हम दर की दर ठोकर खाते रहे ,बदहाल जिंदगी जीते रहे । कभी -कभी भोजन भी नसीब नहीं होता था ।साथ ही साथ पेड़ भी मुरझाने लगा था ।

लेकिन जैसे ही संत जी और तोता के वचन पर अमल करते हुए उस दिन से पेड़ को दुआ देने लगा

और दिनचर्या में हमेशा असमर्थ ,असहाय और जरूरतमंद लोगों को आर्थिक ,शारीरिक और भावनात्मक रूप से यथासम्भव सहयोग करने लगा ।

जैसे -जैसे दुआओं और प्रकृति के आशीर्वाद से पेड़ में हरियाली की कोपलें फूटने के साथ हरियाली बढ़ती गयी ।वैसे -वैसे मेरे जीवन में भी आर्थिक ,मानसिक और भावनात्मक समृद्धि ,खुशहाली बढ़ती गयी ।

वो दिन था और आज का दिन मेरे जीवन में जो सच्ची ख़ुशी है आप सबके सामने है ।

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