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नेताजी सुभाषचंद्र बोस : एक ओजस्वी वक्ता-Subhash chandra bose in hindi

  • बहुमुखी प्रतिभा व व्यक्तित्व के धनी नेताजी सुभाषचंद्र बोस और एक ओजस्वी वक्ता थे ।
  • वे कुशल राजनीतिज्ञ ,प्रशासक भी थे । सेना में साहस का संचार करने वाले सेनानायक और सैनिक थे ।
  • जो स्वाभाव से दार्शनिक ,उत्कृष्ट लेखक ,भविष्यदृष्टा होने के साथ -साथ प्रगतिशील विचारधारा के पुरजोर समर्थन देने वाले व्यक्ति थे ।

भारत के राष्ट्रीय नारा ” जय हिन्द “

  • नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी तथा आक्रामक स्वाभाव के सबसे बड़े नेता थे ।
  • भारत के राष्ट्रीय नारा ” जय हिन्द ” को इन्होंने ही सम्बोधित किया था ।
  • 12 सितंबर 1944 को रंगून के जुबली हॉल में शहीद यतीन्द्र दास के स्मृति दिवस पर नेताजी ने अत्यंत मार्मिक भाषण देते हुए कहा- ‘अब हमारी आजादी निश्चित है, परंतु आजादी बलिदान मांगती है।
  • इन्होंने आज़ाद हिन्द फौज सेना में जोश भरने के लिए ” तुम मुझे खून दो मई तुम्हे आज़ादी दूंगा ” का नारा दिया था ।
  • जो उन दिनों अत्यंत लोकप्रिय नारा बन गया ।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के समय में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ युद्ध करने लिए आज़ाद हिन्द फौज नामक संग़ठन बनाया ।
  • जीत -जीत के नजरिया से समर्पित इस संगठन की शक्ति और जोश के साथ जब नेताजी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की ।
  • कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इससे घबराकर 1941 में ब्रिटिश हुकूमत ने अपने गुप्तचरों को उन्हें मारने का आदेश दे दिया था ।
  • सिंगापूर टाउन हॉल के सामने 5 जून 1943 को नेताजी ने’ सुप्रीम कमांडर ‘ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए “दिल्ली चलो” का नारा दिया था ।
  • इन्होंने जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना के विरुद्ध बर्मा,इम्फाल और कोहिमा में जमकर मोर्चा लिया ।

भारत की अस्थायी सरकार

  • आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से ने 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी भारत की अस्थायी सरकार बनायी।
  • जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी ।
  • इस अस्थायी सरकार को जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप दे दिए थे ।
  • सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।
  • नेताजी सुभाषचंद्र बोस रंगून रेडियो स्टेशन से 6 जुलाई 1944 को महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया ।
  • जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनायें माँगीं

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म

  • 23 जनवरी सन् 1897 को ओड़िशा के कटक शहर में हिन्दू कायस्थ परिवार में जन्म हुआ ।
  • उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था।
  • उनके पिता वे सरकारी वकील थे मगर बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी।
  • वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे।ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें रायबहादुर के ख़िताब से सम्मानित किया था ।
  • कुल 14 संतानों के माता -पिता प्रभावती और जानकीनाथ बोस के 6 बेटियां और 8 बेटे थे ।
  • सुभाष बाबू उनके नवीं संतान थे ।
  • भाइयों में मझले भाई शरद बाबू से ज्यादा स्नेह व लगाव रखते थे ।
  • उन्हें सुभाष बाबू मेजदा कहकर पुकारते थे ।

सुभाष बाबू का प्रतिभा और आक्रमकता

  • सुभाष बाबू का प्रतिभा और आक्रमकता बचपन से ही झलकने लगी थी ।
  • प्राइमरी शिक्षा के दौरान कटक के यूरोपियन स्कूल में अपनी साहस,पराक्रमी और आक्रामक होने का झलक दिखला दिए थे ।
  • जब अँगरेज़ के बिगड़े बच्चे को उन्होंने ईंट के जबाब पत्थर से देकर दिन में ही तारे गिनवा दिए थे ।
  • उनके विचार शुरू से ही क्रन्तिकारी थे ।
  • 1909 में उन्होंने रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया।
  • कॉलेज के दिनों में प्रिन्सिपल बेनीमाधव दास के व्यक्तित्व का सुभाष के मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में सुभाष ने विवेकानन्द साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया था।
  • 1915 में उन्होंने इण्टरमीडियेट की परीक्षा बीमार होने के बावजूद द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की।
  • 1916 में जब वे दर्शनशास्त्र में बीए के छात्र थे किसी बात पर प्रेसीडेंसी कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों के बीच झगड़ा हो गया।
  • सुभाष ने छात्रों का नेतृत्व सम्हाला जिसके कारण उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज से एक साल के लिये निकाल दिया गया ।
  • और परीक्षा देने पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया।
  • प्रतिबंध के दौरान इंटरमीडिएट की तरह बीए में भी कम नम्बर न आने डर से सुभाष ने खूब मन लगाकर पढ़ाई की ।
  • और 1919 में बीए (ऑनर्स) की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।
  • परिणाम के रूप में कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनका दूसरा स्थान आया ।

आईसीएस परीक्षा

  • सुभाष अपने पिता के इच्छानुसार आईसीएस बनने के लिए उन्होंने पिता से चौबीस घण्टे का समय यह सोचने के लिये माँगा ।
  • आख़िरकार उन्होंने परीक्षा देने का फैसला किया और 15 सितम्बर 1919 को इंग्लैण्ड चले गये।
  • परीक्षा की तैयारी के लिये लन्दन के किसी स्कूल में दाखिला न मिलने पर सुभाष को किसी तरह किट्स विलियम हाल में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान की ट्राइपास (ऑनर्स) की परीक्षा का अध्ययन करने हेतु उन्हें प्रवेश मिल गया।
  • इससे उनके रहने व खाने की समस्या हल हो गयी।
  • हाल में एडमीशन लेना तो बहाना था असली मकसद तो आईसीएस में पास होकर दिखाना था।
  • सो उन्होंने 1920 में वरीयता सूची में चौथा स्थान प्राप्त करते हुए पास कर ली।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का आईसीएस से त्यागपत्र

  • दिलो-दिमाग से तो वे स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द घोष के आदर्शों से प्रभावित थे ।
  • इसके कारण सुभाष बाबू के लिए आईसीएस बनकर अंग्रेजों की गुलामी करना असहनीय और पीड़ादायक लगा ।
  • 22 अप्रैल 1921 को भारत सचिव ई०एस० मान्टेग्यू को आईसीएस से त्यागपत्र देने का पत्र लिखा।
  • एक पत्र देशवन्धु चित्तरंजन दास को लिखा।
  • इसके बाद सुभाष ने अपने बड़े भाई शरतचन्द्र बोस तथा माँ को लिखकर उनकी राय जाननी चाही ।
  • किन्तु अपनी माँ प्रभावती का यह पत्र मिलते ही कि “पिता, परिवार के लोग या अन्य कोई कुछ भी कहे उन्हें अपने बेटे के इस फैसले पर गर्व है।
  • मैं तुम्हे आशीर्वाद देती हूँ ।
  • ” सुभाष जून 1921 में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान में ट्राइपास (ऑनर्स) की डिग्री के साथ स्वदेश वापस लौट आये।

बंगाल के स्वतंत्रता सेनानी

  • बंगाल के स्वतंत्रता सेनानी चितरंजन दास के निडरता ,देशप्रेम एवं कुशल व्यक्तित्व से नेताजी बेहद प्रभावित थे।
  • इसलिए चितरंजन दास को उन्होंने अपना राजनितिक गुरु मान लिया था ।
  • चितरंजन दास द्वारा स्थापित कोलकाता में राष्ट्रीय विद्यापीठ महाविद्यालय में प्राचार्य बने ।
  • वे प्राचार्य के कार्य के साथ -साथ ‘बांग्ला कथा “नामक अख़बार का सम्पादन भी करते थे ।
  • अख़बार के माध्यम से सुभाष चंद्र बोस क्रन्तिकारी विचारों का प्रचार करने लगे ।
  • 1923 में चितरंजन दास ने स्वराज दल बनाए ।जिसमे चितरंजन दास के दाहिना हाथ बनकर सक्रिय भूमिका निभाए ।
  • जिससे निर्वाचन में स्वराज्य दल को बहुमत दिलाने में सफल रहे ।जिसके कारण चितरंजन दास कोलकाता के महापौर बने ।
  • लेकिन नेताजी के कार्य से प्रसन्न होकर उन्हें भी कार्यपालक अधिकारी नियुक्त किया ।
  • सुभाषचंद्र बोस जहाँ अंग्रेज़ों के प्रति आक्रामक रवैया रखते थे ।वहीं भारतीय के प्रति दया के भाव रखते थे ।
  • वे अपने थोड़ी सी तनख्वाह में भी गरीब विद्यार्थी ,मित्र और जरूरतमंद लोगों को यथासम्भव मदद भी करते थे ।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस को जेल

  • सुभाष बाबू ने जेल जाने से पहले नगर निगम में प्रगतिशील विचारों और कार्यों से अंगरेज़ों के माथे पर बल पड़ने लगा ।
  • उनकी सक्रियता से तंग आकर अंगरेज़ों के बंगाल सरकार ने 26 जनवरी 1925 को सुभाष को बंदी बनाकर माडले जेल भेज दिया ।
  • उन पर न तो मुकदमा चलाया जा रहा था और न ही उन्हें मुक्त किया जा रहा था ।
  • आखिर बीमार होने के कारण 15 मई 1927 को उन्हें मुक्त कर दिया गया ।
  • स्वस्थ होने के बाद कांग्रेस में सक्रियता से भाग लेने के कारण बंगाल प्रांतीय कांग्रेस समित्ति के अध्यक्ष चुने गए ।
  • इसके बाद अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महामंत्री चुने गए ।

साइमन कमीशन आयोग का बहिष्कार

  • 1929 में साइमन कमीशन आयोग का बहिष्कार करने में सुभाषचंद्र बोस ने अहम योगदान दिए ।
  • उसी वर्ष सुभाषचंद्र बोस , नेहरू और श्रीनिवासन ने मिलकर पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा पारित करवाया था ।
  • उन दिनों गाँधी -इरविन समझौता को सुभाष चद्र बोस कांग्रेस की कमजोरी मानते थे ।
  • इनका विचार था कि – ” यदि हम स्वतंत्रता संग्राम में विजय पाना चाहते हैं ।
  • तो अहिंसा के साथ कूटनीतिज्ञता और अंतर्राष्ट्रीय प्रचार को अनिवार्य रूप से ग्रहण करना चाहिए ।
  • अँगरेज़ सरकार के तत्कालीन गृहसचिव जहां सुभाष बाबू को संस्थाओं के कुशल संगठक मानते थे ।
  • वहीं उनके क्रन्तिकारी विचार के कारण पुलिस सतत उन पर निगरानी रखते थे ।
  • 10 जून 1933 में लंदन में आयोजित तृतीय भारतीय राजनितिक सभा के अधिवेशन में उनका अध्यक्षीय भाषण पढ़कर सुनाया ।
  • क्योंकि उनके लंदन प्रवेश पर प्रतिबंध था ।

कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष

  • 1938 में इंग्लैंड में ही उनको मालूम हुआ वे हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए हैं ।
  • उनका इस अधिवेशन का अध्यक्षीय भाषण उनके इतिहास के बारे में गंभीर ज्ञान के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के असाधारण ज्ञान के परिचायक था ।
  • उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन को क्रियात्मक दिशा देने पर जोर दिया ।
  • 1939 में गाँधी के इच्छा के विपरीत सुभाष बाबू बहुमत से कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए ।
  • जबकि गांधीजी के धुर समर्थक सितपट्टाभी का हार हुई ।
  • इस हार से व्यथित होकर गांधीजी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार माना।
  • हालाँकि कांग्रेस की कार्यकारणी के अधिकतर सदस्यों ने त्याग पत्र दे दिया ।
  • इनसे प्रभावित होकर उनके व गांधीजी के मतभेद उभरकर सामने आये और वे कांग्रेस छोड़ने के लिए बाध्य हो गए ।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा ” फारवर्ड ब्लॉक ” का गठन

  • उन्होंने तीन दिनों के अंदर ही 3 मई 1939 को कोलकाता में ” फारवर्ड ब्लॉक ” नामक दल का गठन किया ।
  • यह कांग्रेस में बिखरी हुई वामशक्ति के एकीकरण का व स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरणा देने का प्रयत्न था ।
  • 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के समय सुभाष चंद्र बोस ने सरकार विरोधी प्रचार प्रारम्भ किया और युद्ध में सरकार की किसी प्रकार की सहायता नहीं देने की अपील की ।
  • अतःब्रटिश शासन ने हॉलवेल स्मारक हटाने के बहाने कैद कर लिया ।यह उनकी ग्यारहवीं व अंतिम जेल यात्रा थी ।
  • धूर्त अंग्रेज़ों शिवाजी की तरह छूटना सम्भव नहीं था ।
  • अतः उन्होंने अपने आत्मबल के आधार पर अंग्रेजी शासन को चुनौती दी ।
  • या तो उन्हें मुक्त किया जाए या वे अनशन कर प्राण त्याग देंगे ।
  • उनके प्राण त्यागने से उत्तपन्न स्थिति को संभालने की क्षमता शासन में नहीं थी ।
  • इस आशय के उनके पत्र उनकी राजनीतिक वसीयत के रूप में प्रसिद्ध है ।

उनके अनशन

  • नेताजी के मात्र सप्ताह भर के अनशन से दमनचक्र के लिए बदनाम अँगरेज़ सरकार हिल गयी ।
  • अब उन्हें घर में ही नजरबंद कर दिया ।केवल कुछ विश्वासपात्र साथी ही गुप्त रूप से मिलते थे ।
  • उनकी भोजन की थाली दरवाजे के पास रखकर लकड़ी से अंदर सरकाई जाती थी ।
  • लोगों में अफवाह फ़ैल चुकी थी ।उन्होंने राजनीतिक जीवन से सन्यास ले लिया है ।
  • 18 जनवरी 1941 मौलवी का रूप धारण करके आधी रात में भवन के पिछले दरवाजे से बाहर निकले जहां पुलिस का पहरा था ।

नेताजी का विदेश गमन

  • एक कार में उनके भतीजे डॉ शिशिर बोस इंतज़ार कररहे थे ।उसमे सुभाष बाबू का कुछ सामान था ।
  • सुबह कार धनबाद पहुंचा ।हालाँकि आगे की यात्रा और अधिक कठिन व खतरनाक थी ।
  • इसके बाबजूद काबुल के रास्ते अत्यंत जोखिमपूर्ण यात्रा तय करके बर्लिन पहुंचे ।ब
  • र्लिन में हिटलर के सहयोग से भारत को आज़ाद कराने के लिए युद्धबंदियों का एक संगठन कायम किया।
  • ‘ आज़ाद हिन्द फौज ‘ का निरीक्षण करते हुए हिटलर ने कहा था – “मैं केवल आठ करोड़ जर्मन लोगों का नेता हूँ ।

32 करोड़ भारतीय जनता का नेता

  • महामहिम नेताजी 32 करोड़ भारतीय जनता का नेता हैं ।मैं उनका अभिवादन करता हूँ ।”
  • आज़ाद हिन्द फौज में परस्पर अभिवादन “जय हिन्द ” का नारा देकर उन्होंने दो कार्य किये थे ।
  • उन्होंने जातीय व धार्मिकता सकीर्णता नष्ट कर सद्भाव निर्माण साथ ही देशप्रेम व देशाभिमान में वृद्धि के लिए माहौल बनाया ।
  • सेना में हिंदी निर्देशों ,हिंदी प्रयाणगीत ,हिंदी में उपाधियाँ स्वीकार करके आज़ाद हिन्द फौज को पूरी तरह भारतीय बना दिया था ।
  • भारतीय सेना के जर्मन ट्रेनर डॉ वॉलटर हारविल ने कहा था – ” भारत में अंदर तक घुसे हुए धार्मिक और जातीय भेदभाव को दूर करके महामहिम नेताजी ने स्वतंत्र वसंपन्न राष्ट्र निर्माण के लिए भारतीय सैनिकों को प्रवृत किया ।
  • आश्चर्य की बात है कि इतने कम समय में अद्भुत परिवर्तन किया ।

हिन्दू रीति रिवाज़ से शादी

  • ऑस्ट्रिया प्रवास के दौरान सुभाष बाबू इलाज कराने के लिए ठहरे हुए थे ।
  • इस समय का उपयोग पुस्तक लिखने के लिए करना चाहते थे ।इसके लिए एक टाइपिस्ट की जरुरत थी ।
  • उसके मित्र ने एक पशु चिकित्सक के पुत्री एमिली शेंकल से मुलाकात करा दी।
  • कार्य करते -करते दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए जो स्वाभाविक प्रेम था ।
  • परिणामस्वरुप दोनों हिन्दू रीति रिवाज़ से शादी के बंधन में बंध गए ।
  • एमिली ने एक पुत्री को जन्म दी जिसका नाम अनीता बोस फॉफ रखा गया ।
  • जिसे सिर्फ एक बार सुभाष बाबू देख पाए ।

बर्लिन से टोकियो

  • रास बिहारी बोस के निमंत्रण पर सुभाष बाबू बर्लिन से जापान की राजधनी टोकियो पहुंचे ।
  • यहां रास बिहारी बोस जापान में आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना करके वहां के निवासियों को अपमान और कष्टों से बचाया ।
  • नेताजी के आने पर इस संघ के अध्यक्ष नेताजी बने ।नेताजी एक साथ दो जगह लड़ रहे थे ।
  • युद्धक्षेत्र व प्रचार के क्षेत्र में भी ।
  • इन्होंने नारी को हीनग्रस्तता और स्त्री मुक्ति का वास्तविक अर्थ देते हुए नारी के हाथ में बंदूक थमाकर उनका मनोबल बढ़ाया ।
  • इससे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में सहयोग करने की क्षमता को अभूतपूर्व शक्ति मिली ।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का घोषणा पत्र

  • 21 अक्टूबर 1943 को घोषणा पत्र तैयार कर नेताजी ने आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की।
  • राष्ट्राध्यक्ष व प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए मंत्रिमंडल की प्रथम बैठक में ही सर्वसम्मति से युद्ध का निर्णय लिया गया ।
  • एक बल सेना भी तैयार की गयी ।
  • जिसका कार्य शस्त्र ,औषधि व महत्वपूर्ण सन्देश पहुँचाना ,जासूसी करना व स्वयं को भावी फौज के लिए तैयार करना था ।
  • इन्होंने आज़ाद हिन्द फौज सेना में जोश भरने के लिए इन्हे सम्भोधित करते हुए सुभष बाबू ने कहा था कि हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज में है ।
  • फिर वे ” तुम मुझे खून दो मई तुम्हे आज़ादी दूंगा ” का नारा देते कहे कि यह स्वतंत्रता देवी की मांग है ।
  • इनसे प्रभावित होकर बाल सेना ने अंग्रेज़ों से लोहा लेते कई युद्ध जीतकर बर्मा के रास्ते कोहिमा पहुंचे ।
  • दुर्भाग्य से उसी समय जापानी सेना लगातार मात खाने लगी ।
  • फिर भी बालसेना ने छाती में बम बांधकर कई अँगरेज़ टैंक उड़ा दिए ।अंग्रेज़ों को नाकों चने चबबा दिए ।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस के कठोर आलोचक

  • कठोर आलोचक अँगरेज़ लेखकों को भी लिखना पड़ा कि एक भी राजनीतिज्ञ उनकी ऊंचाइयों और वैयक्तिक शक्ति की बराबरी नहीं कर सकता ।
  • उनके भाषण से प्रभावित जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री तोजो ने कहा – ” शीघ्र ही अंडमान निकोबार द्वीप आज़ाद हिन्द सरकार को सौंप दूंगा और बिना शर्त पूरी मदद दूंगा ।”
  • नेताजी ने अंडमान को ‘ शहीद ‘ और निकोबार को स्वराज्य नाम दिया था ।
  • इसका प्रशासन हस्तगत करते हुए उन्होंने कहा था ।
  • अंडमान मुक्ति का प्रतीकात्मक महत्व है ।क्योंकि इसका उपयोग अँगरेज़ क्रांतिकारियों को कालेपानी का सज़ा के लिए करते थे ।

आज़ाद हिन्द फौज के विजय अभियान

  • आज़ाद हिन्द फौज के सुभाष बिग्रेड व रानी झाँसी रेजिमेंट ने रंगून सी विजय अभियान शुरू किया ।
  • फौज ने मंज़र रतूरी के नेतृत्व में टेटमा,प्लेटवा ,डलेटमा आदि स्थान जीतने के साथ आगे बढ़ते रहे ।
  • अल्वा चौकी पर तीन बार अंग्रेज़ों ने आक्रमण किया पर हिन्द की वीरों जय हिन्द ! व नेताजी की जय ! नारों के साथ उन्हें हरा दिया ।
  • कोहिमा पर भी तिरंगा फहरा दिया ।
  • नेताजी के मन व शरीर दोनों युद्ध प्रशासन, संगठन ,तीनों क्षेत्र के लिए एक साथ कार्य कर रहे थे ।
  • सदैव फौजों का मनोबल और उत्साह बढ़ाने वाले कार्य करते रहते थे ।
  • हालाँकि इम्फाल में हारकर फौज रंगून लौटी ।अमेरिका ने जापान पर अणुबम फेंक दिया ।
  • जापान ने आत्मसम्पर्ण कर दिया ।परन्तु नेताजी ने भारत का आत्मसमर्पण नहीं माना ।
  • निर्णय हुआ कि दूसरे अवसर कि तलाश किया जाए ।ने
  • ताजी ने पहले सभी हिन्द सेना को बर्मा से बाहर निकालाऔर सभी आवश्यक व्यवस्था करके ही बर्मा से निकले ।
  • 16 अगस्त 1946 को सिंगापुर से बैंकॉक वहां इंडोचायना व फारमोसा द्वीप पर पहुंचे ।
  • इसके बाद की उनकी यात्रा विवादास्पद है । 18 अगस्त 1945 को उनकी विमान दुर्घटना में मृत्यु हुई ।
  • जिसे आज तक विवादास्पद माना जाता है ।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का अहिंसा के प्रति भी आस्था

  • महात्मा गाँधी जहां अहिंसा की नीति से देश को आज़ाद कराने का आधार बनाया था ।
  • वहीं नेताजी की सशस्त्र क्रांति की नीति को आधार बनाया ।इस तरह गांधीजी और नेताजी में वैचारिक मतभेद थे।
  • परन्तु नेताजी के दिल में न केवल गांधीजी अपितु अहिंसा के प्रति भी आस्था थी ।
  • उन्होंने ही सर्वप्रथम रंगून रेडियो पर गांधीजी को ‘ राष्ट्रपिता ‘ कहकर सम्बोधित किया ।
  • इन्होंने एक बार भाषण में कहा था कि -” एक बार भारत स्वतंत्र हो जाए तो इसे मैं गांधीजी को सौंप दूँगा ।
  • और कहूंगा कि अब इसे आपकी अहिंसा कि सबसे ज्यादा जरूरत है ।
  • गांधीजी के प्रति उनकी आस्था की बानगी का उदाहरण यह भी है -जब एशिया सम्मेलन में जापानी प्रधानमंत्री जनरल तोजो ने अंडमान निकोबार भारत को सौंपते दिया ।
  • और कहा कि भारत के प्रमुख नेताजी होंगे तो नेताजी ने कहा – ‘ स्वतंत्र भारत का निर्णय करने का अधिकार केवल जनता होगा ।
  • मैं तो छोटा सेवक हूँ ।प्रमुख होने का मान तो गाँधी ,नेहरू ,पटेल को होगा ।’
  • यह उनकी निःस्वार्थ बुद्धि , निर्भयता के साथ अन्य नेताओं के प्रति आदर को प्रकट करता है ।

वृति से आध्यात्मिक संत

  • नेताजी स्वयं में एक इतिहास थे ।भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के वे कर्मठ व तूफानी नेता थे ।
  • साथ ही नेताजी स्वाभाव से आध्यात्मिक संत भी थे ।
  • विवेकानंद ,अरविन्द घोष आदि का उन पर काफी प्रभाव था । सन्यासी उन्हें आकर्षित करता था ।
  • किशोर उम्र ही पुरे उत्तर भारत की तीर्थ यात्रायें कर लिए थे ।
  • देश के लिए उन्होंने सेनापतित्व स्वीकार किया ।लेकिन उनकी वृति आध्यात्मिक था ।


नेताजी का अंतिम सन्देश

  • उनका अंतिम सन्देश था -मेरा अंत समीप है ।देशवासियों से कहना लड़ाई जारी रखें ।
  • भारत शीघ्र ही आज़ाद होने वाला है ।
  • अंततः उनकी भविष्वाणी अक्षरशः सत्य साबित हुआ ।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

  • भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस और उनकी आज़ाद हिन्द फौज का योगदान अमूल्य है ।
  • इतिहासकार आर सी मजूमदार ने लिखा है कि ” गांधीजी के बाद भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में सबसे प्रमुख व्यक्ति निस्संदेह सुभाषचंद्र बोस ही थे ।”
  • नेताजी कि दृढंत था कि सशस्त्र क्रांति के अतिरिक्त अंग्रेज़ों को भारत से भागने दूसरा मार्ग नहीं है ।
  • नेताजी सहस ,नैतिक बल व सहृदयता कि साक्षात् मूर्ति थे ।अपने सैनिकों को संतान की तरह देखरेख करने में व्यक्तिगत ध्यान देते थे ।
  • सुभाष आम जनता के हित का भी विशेष ध्यान रखते थे ।
  • इसका एक उदाहरण है – जब जापानी सेनाधिकारी ने कोलकाता पर बमवर्षा की योजना उनके समक्ष रखी।
  • तो उन्होंने कहा – ” मैं अपने प्रिय और सुंदर शहर को बमवर्षा से नष्ट -भ्र्ष्ट नहीं होने दूँगा।
  • मैं अपने देशवासियों को संदेश देना चाहता हूँ ।
  • उन्हें कष्ट ,संकट और मृत्यु देने की कैसे सोच सकता हूँ ।

इतिहासकार का मत

  • छात्रावस्था में वे एकांतप्रिय व दयालु थे ।साथ ही स्वाभिमानी व समाजसेवी भी थे ।
  • ” इम्फाल जीतकर मैं कोलकाता पर तिरंगे झंडे की वर्षा करूंगा ।
  • अतःअधिकतर बुद्धिजीवियों का मानना है की नेताजी सम्पूर्ण व्यक्तित्व के स्वामी थे ।
  • जो सभी प्रकार के प्रकाश से सुसज्जित थे ।

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